Sunday, August 30, 2009

दूसरा भजन


भोगों के पीछे ही जब तेरा जीवन बीता है
सच कह मेरे मन फिर भी तू क्यों रीता रीता है

विषयों में फंसने वाला खाली ही रह जाता है
खारे पानी से कोई कहीं प्यास बुझा पाता है
सतसंगत के अमृत को क्यों ना पगले पीता है
सच कह मेरे मन फिर भी तू क्यों रीता रीता है

मन के कुएं को कब से तू भरता ही जाता है
ये बिना तली का झेरा नहीं भरने में आता है
कोल्हू का बैल बना क्यों बेहोशी में जीता है
सच कह मेरे मन फिर भी तू क्यों रीता रीता है

नकली रंगों की दुनिया है तेरा ही मकडी जाला
तू ख़ुद ही बुनकर फंसता जड़ता ममता का ताला
सुरेश चंद दिखलाते पथ मानस व गीता हैं
सच कह मेरे मन फिर भी तू क्यों रीता रीता है

भोगों के पीछे ही जब तेरा जीवन बीता है
सच कह मेरे मन फिर भी तू क्यों रीता रीता है

मेरा पहला गीत


सूरज को मोमबत्ती कब तक कहो दिखाऊँ
तू ही बता दे प्यारे कैसे तुझे रिझाऊँ


तू ही है बाग बगिया, तू ही है फूल फल भी

तोडूँ क्यों तुझको तुझ से, अब भेंट क्या चढाऊं

तू ही बता दे प्यारे कैसे तुझे रिझाऊँ ...


सब और तू ही तू है सब में है नूर तेरा

सब के चरण में अपना सिर क्यों न मैं झुकाऊँ

तू ही बता दे प्यारे .......


गंगा का जल उठाकर वापिस उडेलता हूँ

मैं भी तुझे समर्पित तब और क्या रचाऊँ

तू ही बता दे प्यारे ......


मुह पर हँसी का लेबल, दिल में है दर्द ढेरों

तू जानता है दिल की फिर अश्क क्या बहाऊँ

तू ही बता दे प्यारे ........


सांसों में नाम तेरा, धड़कन में तान तेरी

सुरेश चंद अपना फिर गीत क्या सुनाऊं

तू ही बता दे प्यारे कैसे तुझे रिझाऊँ


सूरज को मोमबत्ती कब तक कहो दिखाऊं

तू ही बता दे प्यारे कैसे तुझे रिझाऊँ