Saturday, December 19, 2009

अवश्य-अवश्य

घास की बालियाँ तुनकी खड़ी हैं
वसंत पवन डुलता है - वे मानिनीं -
असंख्य पतंग एक डोर से बंधीं!

सर्प-सी ग्रीवा ऊँची कर
देखते हैं घास में रूगेल
ख़तरा-आसमान- दिशाएं ?
छोटे-छोटे कदमों से फर्राटे भरते
आगे-पीछे लहरीली चाल में !

पूरी भरी हैं
एक डाली पत्रहीन
कीकरों काबुली की !
उड़ारी भर कर पत्रिंगे
घुंघरुओं की आवाज में, बुलबुलों की खनकवाली
शोर मचाते पुनः आ-आकर !

शकरखोरा, भुजंगा, बुलबुल ऊम-घूम गए
तोतों बडे़वालों का जोड़ नहीं आया
सीवरलाइन की गैस के खम्बे पर
लम्बी पूंछ को पंखे-सी छितरा कर !
चील भी कहीं नहीं -
वह रही दूर, ग्लाइडर की कलाओं से होड़ लेती !

उदास ऊँचाई से लुढ़कता बड़ा गोल-सा पत्थर !
पीछे कुछ छूट गया मंटो भाई !
तुम्हारे बनाये रेखा-चित्रों में गुम था
धूप आ पहुंची है सरक कर सर पर ।
छोटे-छोटे ये संशय मेरे हैं !
मरूँगा भी क्या इन्हीं के साथ ?
अवश्य ! अवश्य !!

जैसे

जैसे केले का गाछ
अचानक सुनहरे पत्ते छोड़ने लग जाये
सूरजमुखी के फूल में इंसानी नक्श उग आयें
सीपियों के युग्म को ज्योति मिल जाये
जैसे लाल कमल वन में बुगलों के पांत
जैसे भवरों के लड़ गुनगुनाती गुजर जाये
चाँद कभी तुम्हारे आगे कभी पीछे
कहीं ठहरने का स्थान न पाए

ऐसे खुलते और गहराते रहस्य-सी
तुम आज घट गयी हो ।