जैसे
जैसे केले का गाछ
अचानक सुनहरे पत्ते छोड़ने लग जाये
सूरजमुखी के फूल में इंसानी नक्श उग आयें
सीपियों के युग्म को ज्योति मिल जाये
जैसे लाल कमल वन में बुगलों के पांत
जैसे भवरों के लड़ गुनगुनाती गुजर जाये
चाँद कभी तुम्हारे आगे कभी पीछे
कहीं ठहरने का स्थान न पाए
ऐसे खुलते और गहराते रहस्य-सी
तुम आज घट गयी हो ।
Saturday, December 19, 2009
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Enjoyed your poem 'Jaise' and especially the two lines about the moon's antics.
ReplyDeleteKeep writing - you and Suresh.