Sunday, November 15, 2009

अस्तित्वगत

मन्दिर का चबूतरा
और रेल का गुजरना
दोनों शोर मचाना बंद करके
शिष्य मुद्रा में दूर खोते चले गए हैं ।

पानी के रंग,
पक्षियों के कलरव
और तितलियों के उड़ानों से परे
पौधों और पेड़ों में बैठा, मैं हरा हो रहा हूँ।

एक उद्देश्य से बच कर
फ़िर दूसरे उद्देश्य तक
खुलासों में बात पीछे छूट रही है ।
फ़िर पतझड़ और आविष्कारों की गिरफ्त में आ रहा हूँ ।

नींद के पहले क्षणों में हरी तन्मयता
नाम पुकारे जाने पर
हरी तन्मयता नहीं रह गई है ।
किसी जंगल में रहने वाले से पूछूँगा, उसके हरे सहवासों का आनंद ।

वसंत की हवा,
कैसे - कैसे पक्षियों की दृष्टियाँ,
गहरी छायाएँ, हरियाली के पड़ोस में उगा सभी कुछ
क्या बता पाया है आज तक अपने अनुभव ?

मगर मैं चाह रहा हूँ
हृदय के तुमुल से तुमुलतर अनुकम्पनों में
एक स्फोट के साथ
वानस्पतिक गंध हो जाऊँ।

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