Sunday, November 15, 2009

अस्तित्वगत

मन्दिर का चबूतरा
और रेल का गुजरना
दोनों शोर मचाना बंद करके
शिष्य मुद्रा में दूर खोते चले गए हैं ।

पानी के रंग,
पक्षियों के कलरव
और तितलियों के उड़ानों से परे
पौधों और पेड़ों में बैठा, मैं हरा हो रहा हूँ।

एक उद्देश्य से बच कर
फ़िर दूसरे उद्देश्य तक
खुलासों में बात पीछे छूट रही है ।
फ़िर पतझड़ और आविष्कारों की गिरफ्त में आ रहा हूँ ।

नींद के पहले क्षणों में हरी तन्मयता
नाम पुकारे जाने पर
हरी तन्मयता नहीं रह गई है ।
किसी जंगल में रहने वाले से पूछूँगा, उसके हरे सहवासों का आनंद ।

वसंत की हवा,
कैसे - कैसे पक्षियों की दृष्टियाँ,
गहरी छायाएँ, हरियाली के पड़ोस में उगा सभी कुछ
क्या बता पाया है आज तक अपने अनुभव ?

मगर मैं चाह रहा हूँ
हृदय के तुमुल से तुमुलतर अनुकम्पनों में
एक स्फोट के साथ
वानस्पतिक गंध हो जाऊँ।

कगार से

फूल का काम है
और प्यारा होते जाना
दिन - पर - दिन अपने भीतर से
निकलते चले जाना खुशबू की बड़ी होती कोंपल
वहाँ तक, जहाँ पहुँच कर
उम्र के आतंक से समय
ढलान पर सरपट दौड़ने लगता है ।

दुःस्वप्न से जाग कर
आधी रात पगलाए मोरों की
आवाजों से घिर जाना
फूल के तिलस्म का
दुधारी ढंग से गाढ़ा होते जाना है ।

हवा के थपेडों में कांपती
चौड़ी नई रिबन है ।
एक तरफ़ बहुत घनी चाँदनी
दूसरी तरफ़ दुपहरी भरी हुई ,
अनदेखे क्षितिज के पार
यह जिस्म का कगार है ।

इन्द्रियाँ परस्पर
क्रम परिवर्तन और संयोजन का
नया गणित रचती हैं अपने एकांत में।

जंगल

(photo by Suresh C Sharma)
मैं गया तो
वह मेरे पास आकर लेट गया ।
कलाई से पकड़ कर
मेरी उंगलियाँ और नाखून
अपनी हरी त्वचा पर महसूस कीं ।

मेरे उठने के हर उपक्रम को
हज़ार बाँहों से रोका ।
मेरे कपडों को जहाँ - तहाँ मैला कर दिया ।
उन्हें फाड़ने को उद्धत हो गया ।

मेरे निर्वस्त्र हो जाने पर
अपनी हजारों - हज़ार आखों की टिकटिकी
मेरे लिए खोल दी ।
मेरी दृष्टि के विस्तार में
फुनगियों की अनंत शैया बिछा दी ।
मेरे तलवों को अपने चुम्बनों से
तर कर दिया ।
मेरे शरीर की कंदराओं को
अपनी बेशुमार निश्वासों का हरा आसमान कर दिया ।
दूर तक के रास्तों को
अपने तन के रंगों से उत्सव कर दिया ।

जब आने लगा
तो नहीं कहा कि ठहर जाओ
या कि फ़िर आना ।
बस मुझे मेरे गणित में
अपनी कटी देह के सुनसानों से होकर आने दिया ।