Sunday, November 15, 2009

कगार से

फूल का काम है
और प्यारा होते जाना
दिन - पर - दिन अपने भीतर से
निकलते चले जाना खुशबू की बड़ी होती कोंपल
वहाँ तक, जहाँ पहुँच कर
उम्र के आतंक से समय
ढलान पर सरपट दौड़ने लगता है ।

दुःस्वप्न से जाग कर
आधी रात पगलाए मोरों की
आवाजों से घिर जाना
फूल के तिलस्म का
दुधारी ढंग से गाढ़ा होते जाना है ।

हवा के थपेडों में कांपती
चौड़ी नई रिबन है ।
एक तरफ़ बहुत घनी चाँदनी
दूसरी तरफ़ दुपहरी भरी हुई ,
अनदेखे क्षितिज के पार
यह जिस्म का कगार है ।

इन्द्रियाँ परस्पर
क्रम परिवर्तन और संयोजन का
नया गणित रचती हैं अपने एकांत में।

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