Sunday, November 15, 2009

जंगल

(photo by Suresh C Sharma)
मैं गया तो
वह मेरे पास आकर लेट गया ।
कलाई से पकड़ कर
मेरी उंगलियाँ और नाखून
अपनी हरी त्वचा पर महसूस कीं ।

मेरे उठने के हर उपक्रम को
हज़ार बाँहों से रोका ।
मेरे कपडों को जहाँ - तहाँ मैला कर दिया ।
उन्हें फाड़ने को उद्धत हो गया ।

मेरे निर्वस्त्र हो जाने पर
अपनी हजारों - हज़ार आखों की टिकटिकी
मेरे लिए खोल दी ।
मेरी दृष्टि के विस्तार में
फुनगियों की अनंत शैया बिछा दी ।
मेरे तलवों को अपने चुम्बनों से
तर कर दिया ।
मेरे शरीर की कंदराओं को
अपनी बेशुमार निश्वासों का हरा आसमान कर दिया ।
दूर तक के रास्तों को
अपने तन के रंगों से उत्सव कर दिया ।

जब आने लगा
तो नहीं कहा कि ठहर जाओ
या कि फ़िर आना ।
बस मुझे मेरे गणित में
अपनी कटी देह के सुनसानों से होकर आने दिया ।

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