घास की बालियाँ तुनकी खड़ी हैं
वसंत पवन डुलता है - वे मानिनीं -
असंख्य पतंग एक डोर से बंधीं!
सर्प-सी ग्रीवा ऊँची कर
देखते हैं घास में रूगेल
ख़तरा-आसमान- दिशाएं ?
छोटे-छोटे कदमों से फर्राटे भरते
आगे-पीछे लहरीली चाल में !
पूरी भरी हैं
एक डाली पत्रहीन
कीकरों काबुली की !
उड़ारी भर कर पत्रिंगे
घुंघरुओं की आवाज में, बुलबुलों की खनकवाली
शोर मचाते पुनः आ-आकर !
शकरखोरा, भुजंगा, बुलबुल ऊम-घूम गए
तोतों बडे़वालों का जोड़ नहीं आया
सीवरलाइन की गैस के खम्बे पर
लम्बी पूंछ को पंखे-सी छितरा कर !
चील भी कहीं नहीं -
वह रही दूर, ग्लाइडर की कलाओं से होड़ लेती !
उदास ऊँचाई से लुढ़कता बड़ा गोल-सा पत्थर !
पीछे कुछ छूट गया मंटो भाई !
तुम्हारे बनाये रेखा-चित्रों में गुम था
धूप आ पहुंची है सरक कर सर पर ।
छोटे-छोटे ये संशय मेरे हैं !
मरूँगा भी क्या इन्हीं के साथ ?
अवश्य ! अवश्य !!
Saturday, December 19, 2009
जैसे
जैसे केले का गाछ
अचानक सुनहरे पत्ते छोड़ने लग जाये
सूरजमुखी के फूल में इंसानी नक्श उग आयें
सीपियों के युग्म को ज्योति मिल जाये
जैसे लाल कमल वन में बुगलों के पांत
जैसे भवरों के लड़ गुनगुनाती गुजर जाये
चाँद कभी तुम्हारे आगे कभी पीछे
कहीं ठहरने का स्थान न पाए
ऐसे खुलते और गहराते रहस्य-सी
तुम आज घट गयी हो ।
जैसे केले का गाछ
अचानक सुनहरे पत्ते छोड़ने लग जाये
सूरजमुखी के फूल में इंसानी नक्श उग आयें
सीपियों के युग्म को ज्योति मिल जाये
जैसे लाल कमल वन में बुगलों के पांत
जैसे भवरों के लड़ गुनगुनाती गुजर जाये
चाँद कभी तुम्हारे आगे कभी पीछे
कहीं ठहरने का स्थान न पाए
ऐसे खुलते और गहराते रहस्य-सी
तुम आज घट गयी हो ।
Sunday, November 15, 2009
अस्तित्वगत
मन्दिर का चबूतरा
और रेल का गुजरना
दोनों शोर मचाना बंद करके
शिष्य मुद्रा में दूर खोते चले गए हैं ।
पानी के रंग,
पक्षियों के कलरव
और तितलियों के उड़ानों से परे
पौधों और पेड़ों में बैठा, मैं हरा हो रहा हूँ।
एक उद्देश्य से बच कर
फ़िर दूसरे उद्देश्य तक
खुलासों में बात पीछे छूट रही है ।
फ़िर पतझड़ और आविष्कारों की गिरफ्त में आ रहा हूँ ।
नींद के पहले क्षणों में हरी तन्मयता
नाम पुकारे जाने पर
हरी तन्मयता नहीं रह गई है ।
किसी जंगल में रहने वाले से पूछूँगा, उसके हरे सहवासों का आनंद ।
वसंत की हवा,
कैसे - कैसे पक्षियों की दृष्टियाँ,
गहरी छायाएँ, हरियाली के पड़ोस में उगा सभी कुछ
क्या बता पाया है आज तक अपने अनुभव ?
मगर मैं चाह रहा हूँ
हृदय के तुमुल से तुमुलतर अनुकम्पनों में
एक स्फोट के साथ
वानस्पतिक गंध हो जाऊँ।
और रेल का गुजरना
दोनों शोर मचाना बंद करके
शिष्य मुद्रा में दूर खोते चले गए हैं ।
पानी के रंग,
पक्षियों के कलरव
और तितलियों के उड़ानों से परे
पौधों और पेड़ों में बैठा, मैं हरा हो रहा हूँ।
एक उद्देश्य से बच कर
फ़िर दूसरे उद्देश्य तक
खुलासों में बात पीछे छूट रही है ।
फ़िर पतझड़ और आविष्कारों की गिरफ्त में आ रहा हूँ ।
नींद के पहले क्षणों में हरी तन्मयता
नाम पुकारे जाने पर
हरी तन्मयता नहीं रह गई है ।
किसी जंगल में रहने वाले से पूछूँगा, उसके हरे सहवासों का आनंद ।
वसंत की हवा,
कैसे - कैसे पक्षियों की दृष्टियाँ,
गहरी छायाएँ, हरियाली के पड़ोस में उगा सभी कुछ
क्या बता पाया है आज तक अपने अनुभव ?
मगर मैं चाह रहा हूँ
हृदय के तुमुल से तुमुलतर अनुकम्पनों में
एक स्फोट के साथ
वानस्पतिक गंध हो जाऊँ।
कगार से
फूल का काम है
और प्यारा होते जाना
दिन - पर - दिन अपने भीतर से
निकलते चले जाना खुशबू की बड़ी होती कोंपल
वहाँ तक, जहाँ पहुँच कर
उम्र के आतंक से समय
ढलान पर सरपट दौड़ने लगता है ।
दुःस्वप्न से जाग कर
आधी रात पगलाए मोरों की
आवाजों से घिर जाना
फूल के तिलस्म का
दुधारी ढंग से गाढ़ा होते जाना है ।
हवा के थपेडों में कांपती
चौड़ी नई रिबन है ।
एक तरफ़ बहुत घनी चाँदनी
दूसरी तरफ़ दुपहरी भरी हुई ,
अनदेखे क्षितिज के पार
यह जिस्म का कगार है ।
इन्द्रियाँ परस्पर
क्रम परिवर्तन और संयोजन का
नया गणित रचती हैं अपने एकांत में।
और प्यारा होते जाना
दिन - पर - दिन अपने भीतर से
निकलते चले जाना खुशबू की बड़ी होती कोंपल
वहाँ तक, जहाँ पहुँच कर
उम्र के आतंक से समय
ढलान पर सरपट दौड़ने लगता है ।
दुःस्वप्न से जाग कर
आधी रात पगलाए मोरों की
आवाजों से घिर जाना
फूल के तिलस्म का
दुधारी ढंग से गाढ़ा होते जाना है ।
हवा के थपेडों में कांपती
चौड़ी नई रिबन है ।
एक तरफ़ बहुत घनी चाँदनी
दूसरी तरफ़ दुपहरी भरी हुई ,
अनदेखे क्षितिज के पार
यह जिस्म का कगार है ।
इन्द्रियाँ परस्पर
क्रम परिवर्तन और संयोजन का
नया गणित रचती हैं अपने एकांत में।
जंगल
(photo by Suresh C Sharma)मैं गया तो
वह मेरे पास आकर लेट गया ।
कलाई से पकड़ कर
मेरी उंगलियाँ और नाखून
अपनी हरी त्वचा पर महसूस कीं ।
मेरे उठने के हर उपक्रम को
हज़ार बाँहों से रोका ।
मेरे कपडों को जहाँ - तहाँ मैला कर दिया ।
उन्हें फाड़ने को उद्धत हो गया ।
मेरे निर्वस्त्र हो जाने पर
अपनी हजारों - हज़ार आखों की टिकटिकी
मेरे लिए खोल दी ।
मेरी दृष्टि के विस्तार में
फुनगियों की अनंत शैया बिछा दी ।
मेरे तलवों को अपने चुम्बनों से
तर कर दिया ।
मेरे शरीर की कंदराओं को
अपनी बेशुमार निश्वासों का हरा आसमान कर दिया ।
दूर तक के रास्तों को
अपने तन के रंगों से उत्सव कर दिया ।
जब आने लगा
तो नहीं कहा कि ठहर जाओ
या कि फ़िर आना ।
बस मुझे मेरे गणित में
अपनी कटी देह के सुनसानों से होकर आने दिया ।
वह मेरे पास आकर लेट गया ।
कलाई से पकड़ कर
मेरी उंगलियाँ और नाखून
अपनी हरी त्वचा पर महसूस कीं ।
मेरे उठने के हर उपक्रम को
हज़ार बाँहों से रोका ।
मेरे कपडों को जहाँ - तहाँ मैला कर दिया ।
उन्हें फाड़ने को उद्धत हो गया ।
मेरे निर्वस्त्र हो जाने पर
अपनी हजारों - हज़ार आखों की टिकटिकी
मेरे लिए खोल दी ।
मेरी दृष्टि के विस्तार में
फुनगियों की अनंत शैया बिछा दी ।
मेरे तलवों को अपने चुम्बनों से
तर कर दिया ।
मेरे शरीर की कंदराओं को
अपनी बेशुमार निश्वासों का हरा आसमान कर दिया ।
दूर तक के रास्तों को
अपने तन के रंगों से उत्सव कर दिया ।
जब आने लगा
तो नहीं कहा कि ठहर जाओ
या कि फ़िर आना ।
बस मुझे मेरे गणित में
अपनी कटी देह के सुनसानों से होकर आने दिया ।
Sunday, September 27, 2009
गीत
यह जीवन घुटन हुआ भइया
तोतों ने जंगल को छोड़ा
पंखों ने नभ नाता तोडा
दाने पानी की खातिर ही
पिंजरों से नव रिश्ता जोड़ा
माती से कटने लगे सभी
उल्टा चलन चला भैया
यह जीवन घुटन हुआ भैया
अंधे कूपों से भरी धरा
काले गह्वर सी हुई दिशा
गगन हो गया गूंगा बहरा
ये जीवन इनके बीच फंसा
चिडिया सी हँसी के बदले में
नभ जितना रुदन मिला भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
ह्त्या कोई ख़बर नहीं
हर तरफ़ जहर भी जहर नहीं
वृक्षों पर काले धुएँ का
है कहर मगर अब कहर नहीं
नदियों का भारत, अब गंदे
नालों का मिलन हुआ भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
यह ढोंग रचाया बोनों ने
षडयंत बनाया बोनों ने
चाबी बोनों के हाथ थमा
कद वाले खड़े खिलोनो से
चुपचाप तमाशा देख रहे
कैसा पतन हुआ भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
हैं नागफनी के चक्रव्यूह
लोगों के कई कई गुए मुहं
हैं नया व्याकरण लाड रहे
फूलों पर काँटों के समूह
विज्ञापन के बल मौसम में
बतियाना कठिन हुआ भइया
यह जीवन घुटन हुआ भइया
(५-५-८९ को लिखा गया गीत)
तोतों ने जंगल को छोड़ा
पंखों ने नभ नाता तोडा
दाने पानी की खातिर ही
पिंजरों से नव रिश्ता जोड़ा
माती से कटने लगे सभी
उल्टा चलन चला भैया
यह जीवन घुटन हुआ भैया
अंधे कूपों से भरी धरा
काले गह्वर सी हुई दिशा
गगन हो गया गूंगा बहरा
ये जीवन इनके बीच फंसा
चिडिया सी हँसी के बदले में
नभ जितना रुदन मिला भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
ह्त्या कोई ख़बर नहीं
हर तरफ़ जहर भी जहर नहीं
वृक्षों पर काले धुएँ का
है कहर मगर अब कहर नहीं
नदियों का भारत, अब गंदे
नालों का मिलन हुआ भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
यह ढोंग रचाया बोनों ने
षडयंत बनाया बोनों ने
चाबी बोनों के हाथ थमा
कद वाले खड़े खिलोनो से
चुपचाप तमाशा देख रहे
कैसा पतन हुआ भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
हैं नागफनी के चक्रव्यूह
लोगों के कई कई गुए मुहं
हैं नया व्याकरण लाड रहे
फूलों पर काँटों के समूह
विज्ञापन के बल मौसम में
बतियाना कठिन हुआ भइया
यह जीवन घुटन हुआ भइया
(५-५-८९ को लिखा गया गीत)
कवित्त
मावसों का अंधकार
रोक लूँगा पास निज
आप रहो चांदनी का
आइना निहारती
चोट पत्झाढ़ की मैं
ओट लूँगा वक्ष पर
सुमनों से आप रहो
सपने सवांरती
धूल भी मरुस्थलों की
झेल लूँगा आंखों में ही
रहो आप प्रिया मेरी
खुशियाँ बुहारती
तहखाने लादे लादे
काट लूँगा जैसे तैसे
आप रहो सुख भरी
जिन्दगी गुजारती
(१९८९ की लिखी हुई)
रोक लूँगा पास निज
आप रहो चांदनी का
आइना निहारती
चोट पत्झाढ़ की मैं
ओट लूँगा वक्ष पर
सुमनों से आप रहो
सपने सवांरती
धूल भी मरुस्थलों की
झेल लूँगा आंखों में ही
रहो आप प्रिया मेरी
खुशियाँ बुहारती
तहखाने लादे लादे
काट लूँगा जैसे तैसे
आप रहो सुख भरी
जिन्दगी गुजारती
(१९८९ की लिखी हुई)
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