Sunday, September 27, 2009

कवित्त

मावसों का अंधकार
रोक लूँगा पास निज
आप रहो चांदनी का
आइना निहारती

चोट पत्झाढ़ की मैं
ओट लूँगा वक्ष पर
सुमनों से आप रहो
सपने सवांरती

धूल भी मरुस्थलों की
झेल लूँगा आंखों में ही
रहो आप प्रिया मेरी
खुशियाँ बुहारती

तहखाने लादे लादे
काट लूँगा जैसे तैसे
आप रहो सुख भरी
जिन्दगी गुजारती

(१९८९ की लिखी हुई)

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