मावसों का अंधकार
रोक लूँगा पास निज
आप रहो चांदनी का
आइना निहारती
चोट पत्झाढ़ की मैं
ओट लूँगा वक्ष पर
सुमनों से आप रहो
सपने सवांरती
धूल भी मरुस्थलों की
झेल लूँगा आंखों में ही
रहो आप प्रिया मेरी
खुशियाँ बुहारती
तहखाने लादे लादे
काट लूँगा जैसे तैसे
आप रहो सुख भरी
जिन्दगी गुजारती
(१९८९ की लिखी हुई)
Sunday, September 27, 2009
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