Sunday, September 27, 2009
गीत
तोतों ने जंगल को छोड़ा
पंखों ने नभ नाता तोडा
दाने पानी की खातिर ही
पिंजरों से नव रिश्ता जोड़ा
माती से कटने लगे सभी
उल्टा चलन चला भैया
यह जीवन घुटन हुआ भैया
अंधे कूपों से भरी धरा
काले गह्वर सी हुई दिशा
गगन हो गया गूंगा बहरा
ये जीवन इनके बीच फंसा
चिडिया सी हँसी के बदले में
नभ जितना रुदन मिला भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
ह्त्या कोई ख़बर नहीं
हर तरफ़ जहर भी जहर नहीं
वृक्षों पर काले धुएँ का
है कहर मगर अब कहर नहीं
नदियों का भारत, अब गंदे
नालों का मिलन हुआ भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
यह ढोंग रचाया बोनों ने
षडयंत बनाया बोनों ने
चाबी बोनों के हाथ थमा
कद वाले खड़े खिलोनो से
चुपचाप तमाशा देख रहे
कैसा पतन हुआ भइया
ये जीवन घुटन हुआ भइया
हैं नागफनी के चक्रव्यूह
लोगों के कई कई गुए मुहं
हैं नया व्याकरण लाड रहे
फूलों पर काँटों के समूह
विज्ञापन के बल मौसम में
बतियाना कठिन हुआ भइया
यह जीवन घुटन हुआ भइया
(५-५-८९ को लिखा गया गीत)
कवित्त
रोक लूँगा पास निज
आप रहो चांदनी का
आइना निहारती
चोट पत्झाढ़ की मैं
ओट लूँगा वक्ष पर
सुमनों से आप रहो
सपने सवांरती
धूल भी मरुस्थलों की
झेल लूँगा आंखों में ही
रहो आप प्रिया मेरी
खुशियाँ बुहारती
तहखाने लादे लादे
काट लूँगा जैसे तैसे
आप रहो सुख भरी
जिन्दगी गुजारती
(१९८९ की लिखी हुई)
Thursday, September 24, 2009
ग़ज़ल
Sunday, September 20, 2009
एक और ग़ज़ल

जंगली पेडों से रिश्ता कट गया।
अब नहीं खिलता यहाँ कोई कमल,
ताल ये अब गंदगी से अंट गया।
आप भी चलते बने कुछ इस तरह
राह लम्बी हो गई, मैं घट गया।
आँख पर ऐनक चढा पश्चिम बनी
शब्द भी अपनी जमीं से कट गया।
ईंट, लोहे, पत्रों की बाढ़ में
घोंसले सा घर कभी का मिट गया।
बरगदों से ही कहो छू ले उसे
आदमी जो ताजगी से कट गया।
तो बना लूँ क्या मकान अपना वहीं
हर दिवस, हर रोज मैं मरघट गया।
एक तो सारस अकेला, दूसरे
झील का दिल सूखकर फ़िर फट गया।
(दिसम्बर १९८८)
एक चतुष्पदी
Saturday, September 19, 2009
कवित्त (१३-३-१९८६ को लिखा गया)
एक और कवित्त (३-२-१९८६) को लिखा गया
एक पुराना कवित्त
Wednesday, September 16, 2009

गुनगुने पानी का झरना बर्फ में ढलता रहा
उम्र का सूरज बेचारा व्यर्थ ही जलता रहा
स्वप्न की चिडियां शहर में कैद होकर रह गयी
पेड़ जीवन का ठगा सा हाथ ही मलता रहा
जिन्दगी से मिट रहे हैं झील हरियाली गगन
इस महानगरी का घेरा इस कदर फलता रहा
तितलियों के बाग़ में है फूल खुसबू हर तरफ़
एक कोहरा सा घना मेरे यहाँ पलता रहा
कह रहा मुझको मसीहा दे रहा शूली मगर
खूब किस भोली अदा से वो मुझे छलता रहा
मावासो के रास्तों में चाँद की मंजिल कहाँ
पालकर इक भ्रम रुपहला शखश हर चलता रहा
बंद कमरों की बहरे रास न आई मुझे
जंगली पत्झाढ़ से मैं हंस हंस गले मिलता रहा
यार तेरी हाँ भरी वो रेल न आई कभी
मैं हरे सिग्नल सरीखा उम्र भर जलता रहा
जनवरी 1990

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26-10-1984a
Thursday, September 10, 2009
चलो कहीं जंगल में यारों

चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें
बहुत हो गई आपा धापी दौढ़धूप व धक्कम धक्का
सीना जोरी लूट मार व बेमतलब की भग्गम भग्गा
जो आजादी इन से चाहो इन से अपना पिंड छुडाएं
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें
पड़े अगर अख़बार तो उसमें भरा हुआ है खून खराबा
और अगर सड़को पर जायें वहां से उड़ता शोर शराबा
बढ़ पीपल शीशम के नीचे चिडियों का कलरव सुन आयें
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें
हवा प्रदूषित पानी दूषित खाना दूषित पीना दूषित
रहन सहन की शैली दूषित रिश्ते दूषित बातें दूषित
पत्तों की थाली पर रखकर कंदमूल से भूख मिटायें
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें
आंखों में पैसे का थैला मन बुद्धि मैं लालच मैला
घर घर में विघटन है फैला अंहकार को नाग विषैला
वनदेवी के चरण छुआकर मन बुद्धि को साफ बनायें
चालों कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें
चातक पीलक कोयल फुदकी दरजिन तोते हरियल चुटकी
मोर पपीहे हुदहुद घुघी मुर्गाबी बत्तख की दुबकी
घास फूस का बना बिछोना स्वच्छ झील के पास बिछाएं
चलो कजिन जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें
हवा का झोंका
Sunday, September 6, 2009
एक प्रेम गीत

पर निकल उन पर हैं आए आज क्यों सुरखाब के
कौन सा जादू प्रिये मेरी चलाया आपने
क्यों नहीं मुझको जलाती रास्ते की आग भी
इन्द्रधनुषी लग रहें हैं क्यों शहर के काग भी
जब से तुम चलने लगे हो मीत मेरे साथ में
कौन सा जादू प्रिये मेरी चलाया आपने
रूप सागर सामने मेरे खड़ा कहने लगा
क्यों न मुझको बांह में अब ओ कवि तू ले उठा
आज थोडी देर बैठे आप मेरे सामने
कौन सा जादू प्रिये मेरी चलाया आपने
गाढ़ दो जो शुष्क टहनी आप सूखे रेत में
वो बदल जायेगी बस यूँ लहलहाते खेत में
मीत तुम मुझको संभालो आज अपने हाथ से
कौन सा जादू प्रिये मेरी चलाया आपने
हैं नयन खंजन युगल या दीप मन्दिर में जले
चांदनी सी हथेलियों में प्यार के हैं घोंसले
भूल जाए दर्द भी दुःख मीत तेरे सामने
कौन सा जादू प्रिये मेरी चलाया आपने
रह में मेरी खड़े जो नागफन के झाड़ थे
पर नुकल उन पर हैं आए आज क्यों सुरखाब के
कौन ला जादू प्रिये मेरी चलाया आपने
Thursday, September 3, 2009
मेरा चौथा गीत

दूसरों के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे
होंठ पर है झूंठ जिनके खूब बजते शंख उनके
गालियों के शोर में तू गीत अपने गुनगुना रे
दूसरो के दर्द ले जुड दर्द उपने यूँ भुला रे
आँख में jagte सपन हैं पर अंधेरों के कफ़न हैं
रौशनी घर में नहिंस तो रौशनी में घर बना रे
दूसरो के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे
आंधियां हर बार रूठी घोंसलों की डाल टूटी
प्रेम उपवन अनमना है आस इसकी फिर बंधा रे
दूसरो के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे
गीत जिनको तू सुनाता आईने jinko
वे badhir andhe बने shesh जीवन मत ganwan रे
दर्द का हिम और अपने aansuon में मत गला रे
दूसरो के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे
Wednesday, September 2, 2009
मेरा तीसरा गीत

चीज हो असल की वो पाऊँ मैं किस तरह
घोंसले बेचैन हैं जंगल में आज फिर
कुल्हाडियों से पेड बचाऊँ मैं किस तरह
घर दूकान बन गए शहर में आपके
दर यहाँ फिर आपका पाऊँ मैं किस तरह
अब तो शहर में हर तरफ़ केवल मशीन हैं
आवाज आदमी को लगाऊं मैं किस तरह
रौशनी और चांदनी में नाचती जमीं
बारूद इस जमीं से हटाऊँ मैं किस तरह






