Wednesday, September 2, 2009

मेरा तीसरा गीत


परछाइयों के देश में जाऊँ मैं किस जगह
चीज हो असल की वो पाऊँ मैं किस तरह

घोंसले बेचैन हैं जंगल में आज फिर
कुल्हाडियों से पेड बचाऊँ मैं किस तरह

घर दूकान बन गए शहर में आपके
दर यहाँ फिर आपका पाऊँ मैं किस तरह

अब तो शहर में हर तरफ़ केवल मशीन हैं
आवाज आदमी को लगाऊं मैं किस तरह

रौशनी और चांदनी में नाचती जमीं
बारूद इस जमीं से हटाऊँ मैं किस तरह

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