Sunday, September 20, 2009

एक और ग़ज़ल


आदमी गमलों से इतना सट गया,
जंगली पेडों से रिश्ता कट गया।

अब नहीं खिलता यहाँ कोई कमल,
ताल ये अब गंदगी से अंट गया।

आप भी चलते बने कुछ इस तरह
राह लम्बी हो गई, मैं घट गया।

आँख पर ऐनक चढा पश्चिम बनी
शब्द भी अपनी जमीं से कट गया।

ईंट, लोहे, पत्रों की बाढ़ में
घोंसले सा घर कभी का मिट गया।

बरगदों से ही कहो छू ले उसे
आदमी जो ताजगी से कट गया।

तो बना लूँ क्या मकान अपना वहीं
हर दिवस, हर रोज मैं मरघट गया।

एक तो सारस अकेला, दूसरे
झील का दिल सूखकर फ़िर फट गया।
(दिसम्बर १९८८)

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