Saturday, September 19, 2009

एक पुराना कवित्त


टूटे फूटे खाली डिब्बे
छितरे पड़े हैं यहाँ
निर्जन उजड़ा हुआ
जिन्दगी का मेला है ।

दिन नहीं, रात नहीं,
सांझ नहीं, प्रात नहीं,
आग नहीं, ठण्ड नहीं,
कैसी यह वेला है।

दिशा नहीं, राह नहीं,
मंजिल कहीं भी नहीं,
हरपल भटकाए,
कैसा ये झमेला है

हुआ है धमाका एक
पक्षी सारे उड़ गए,
टूटे पात, अधजला
पेड़ ये अकेला है।

(३-२-१९८६)

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