
टूटे फूटे खाली डिब्बे
छितरे पड़े हैं यहाँ
निर्जन उजड़ा हुआ
जिन्दगी का मेला है ।
दिन नहीं, रात नहीं,
सांझ नहीं, प्रात नहीं,
आग नहीं, ठण्ड नहीं,
कैसी यह वेला है।
दिशा नहीं, राह नहीं,
मंजिल कहीं भी नहीं,
हरपल भटकाए,
कैसा ये झमेला है
हुआ है धमाका एक
पक्षी सारे उड़ गए,
टूटे पात, अधजला
पेड़ ये अकेला है।
(३-२-१९८६)
छितरे पड़े हैं यहाँ
निर्जन उजड़ा हुआ
जिन्दगी का मेला है ।
दिन नहीं, रात नहीं,
सांझ नहीं, प्रात नहीं,
आग नहीं, ठण्ड नहीं,
कैसी यह वेला है।
दिशा नहीं, राह नहीं,
मंजिल कहीं भी नहीं,
हरपल भटकाए,
कैसा ये झमेला है
हुआ है धमाका एक
पक्षी सारे उड़ गए,
टूटे पात, अधजला
पेड़ ये अकेला है।
(३-२-१९८६)
No comments:
Post a Comment