Thursday, September 24, 2009

ग़ज़ल


व्याकरण के ग्रन्थ तो मोटे लगे
चोखटे सारे मुझे छोटे लगे

छिद्र तो भीतर छुपाकर रख लिए
यूँ दिखावट के लिए गोटे लगे

बिन जड़ो के बुद्धिजीवी देश के
मात्र बेपेंदी के वे लोटे लगे

लाज का जंगल उगा जब सामने
तो मचलने गीत-हिरनौटे लगे

कोंपलों सा एक चेहरा देखकर
सब पुते चेहरे बड़े खोटे लगे

(११-२-१९९० को लिखी गई)

1 comment:

  1. कितनी सुन्दर रचना । आभार

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