Thursday, September 3, 2009

मेरा चौथा गीत


दर्द का हिम और अपने आंसुओं में मत गला रे
दूसरों के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे

होंठ पर है झूंठ जिनके खूब बजते शंख उनके
गालियों के शोर में तू गीत अपने गुनगुना रे
दूसरो के दर्द ले जुड दर्द उपने यूँ भुला रे

आँख में jagte सपन हैं पर अंधेरों के कफ़न हैं
रौशनी घर में नहिंस तो रौशनी में घर बना रे
दूसरो के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे

आंधियां हर बार रूठी घोंसलों की डाल टूटी
प्रेम उपवन अनमना है आस इसकी फिर बंधा रे
दूसरो के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे

गीत जिनको तू सुनाता आईने jinko
वे badhir andhe बने shesh जीवन मत ganwan रे
दर्द का हिम और अपने aansuon में मत गला रे
दूसरो के दर्द से जुड दर्द अपने यूँ भुला रे


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