Saturday, September 19, 2009

एक और कवित्त (३-२-१९८६) को लिखा गया


तेज-तेज चल रही,
आंधियां मिटाती हुई,
राह के निशान सब
रेतीले विस्तार में।

ह्रदय के सच्चे सिक्के
खोते हो गए हैं अब
तभी तो मैं भूखा रहा
रिश्तों के बाज़ार में ।

ख़ुद को ही दोष दे लूँ
प्रेम बीज आज तक
उगे नहीं क्योंकि मेरे
आंसुओं की धार से ।

आपके स्नेह का दीया
खोजता रहूँगा सदा
चारों और फैले हुए
काले अंधकार में।

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