
ये भी कोई जीना हुआ,
नगर-निवासियों का,
खामखा ही बोझ मरो
रूटीन के भार से।
कुछ पल के लिए तो
भूल जाओ काम-धाम
देखो हरे दीप जले
पेडों की कतार में।
कलचिडी, दहंगल,
कोयल सुरीले बोल
बोल रहे चारों ओर
आपके सत्कार में ।
एक बार देखो ज़रा
तुम्हे ही बुला रहे हैं
सफ़ेद और बैंगनी
फूल कचनार के।
नगर-निवासियों का,
खामखा ही बोझ मरो
रूटीन के भार से।
कुछ पल के लिए तो
भूल जाओ काम-धाम
देखो हरे दीप जले
पेडों की कतार में।
कलचिडी, दहंगल,
कोयल सुरीले बोल
बोल रहे चारों ओर
आपके सत्कार में ।
एक बार देखो ज़रा
तुम्हे ही बुला रहे हैं
सफ़ेद और बैंगनी
फूल कचनार के।
No comments:
Post a Comment