Saturday, September 19, 2009

कवित्त (१३-३-१९८६ को लिखा गया)


ये भी कोई जीना हुआ,
नगर-निवासियों का,
खामखा ही बोझ मरो
रूटीन के भार से।

कुछ पल के लिए तो
भूल जाओ काम-धाम
देखो हरे दीप जले
पेडों की कतार में।

कलचिडी, दहंगल,
कोयल सुरीले बोल
बोल रहे चारों ओर
आपके सत्कार में ।

एक बार देखो ज़रा
तुम्हे ही बुला रहे हैं
सफ़ेद और बैंगनी
फूल कचनार के।

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