
गुनगुने पानी का झरना बर्फ में ढलता रहा
उम्र का सूरज बेचारा व्यर्थ ही जलता रहा
स्वप्न की चिडियां शहर में कैद होकर रह गयी
पेड़ जीवन का ठगा सा हाथ ही मलता रहा
जिन्दगी से मिट रहे हैं झील हरियाली गगन
इस महानगरी का घेरा इस कदर फलता रहा
तितलियों के बाग़ में है फूल खुसबू हर तरफ़
एक कोहरा सा घना मेरे यहाँ पलता रहा
कह रहा मुझको मसीहा दे रहा शूली मगर
खूब किस भोली अदा से वो मुझे छलता रहा
मावासो के रास्तों में चाँद की मंजिल कहाँ
पालकर इक भ्रम रुपहला शखश हर चलता रहा
बंद कमरों की बहरे रास न आई मुझे
जंगली पत्झाढ़ से मैं हंस हंस गले मिलता रहा
यार तेरी हाँ भरी वो रेल न आई कभी
मैं हरे सिग्नल सरीखा उम्र भर जलता रहा
जनवरी 1990
यार तेरी हाँ भरी वो रेल न आई कभी
ReplyDeleteमैं हरे सिग्नल सरीखा उम्र भर जलता रहा
bahut khoob, lajawaab.
Dhanyawad Yogesh ji. Lekin yag meri 19 varsh purani kavit hai: Suresh
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