
व्याकरण के ग्रन्थ तो मोटे लगे
चोखटे सारे मुझे छोटे लगे
छिद्र तो भीतर छुपाकर रख लिए
यूँ दिखावट के लिए गोटे लगे
बिन जड़ो के बुद्धिजीवी देश के
मात्र बेपेंदी के वे लोटे लगे
लाज का जंगल उगा जब सामने
तो मचलने गीत-हिरनौटे लगे
कोंपलों सा एक चेहरा देखकर
सब पुते चेहरे बड़े खोटे लगे
(११-२-१९९० को लिखी गई)
चोखटे सारे मुझे छोटे लगे
छिद्र तो भीतर छुपाकर रख लिए
यूँ दिखावट के लिए गोटे लगे
बिन जड़ो के बुद्धिजीवी देश के
मात्र बेपेंदी के वे लोटे लगे
लाज का जंगल उगा जब सामने
तो मचलने गीत-हिरनौटे लगे
कोंपलों सा एक चेहरा देखकर
सब पुते चेहरे बड़े खोटे लगे
(११-२-१९९० को लिखी गई)
कितनी सुन्दर रचना । आभार
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