Thursday, September 10, 2009

चलो कहीं जंगल में यारों


नष्ट हो गया अबतक जीवन बचे खुचे को सही बनायें
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें

बहुत हो गई आपा धापी दौढ़धूप व धक्कम धक्का
सीना जोरी लूट मार व बेमतलब की भग्गम भग्गा
जो आजादी इन से चाहो इन से अपना पिंड छुडाएं
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें

पड़े अगर अख़बार तो उसमें भरा हुआ है खून खराबा
और अगर सड़को पर जायें वहां से उड़ता शोर शराबा
बढ़ पीपल शीशम के नीचे चिडियों का कलरव सुन आयें
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें

हवा प्रदूषित पानी दूषित खाना दूषित पीना दूषित
रहन सहन की शैली दूषित रिश्ते दूषित बातें दूषित
पत्तों की थाली पर रखकर कंदमूल से भूख मिटायें
चलो कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें

आंखों में पैसे का थैला मन बुद्धि मैं लालच मैला
घर घर में विघटन है फैला अंहकार को नाग विषैला
वनदेवी के चरण छुआकर मन बुद्धि को साफ बनायें
चालों कहीं जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें

चातक पीलक कोयल फुदकी दरजिन तोते हरियल चुटकी
मोर पपीहे हुदहुद घुघी मुर्गाबी बत्तख की दुबकी
घास फूस का बना बिछोना स्वच्छ झील के पास बिछाएं
चलो कजिन जंगल में यारों आओ अपनी कुटी बनायें


2 comments:

  1. Excellent poetry,No doubt even I feel I wasted 60 years of my life and now I feel each and every moment of my life should be utilised to watch nature .Nature is benign , loving and caring,I wanted to write comments in hindi but I don't know how to do on computer.

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  2. Dear Sarbjeet ji,
    Thank you for your kind appreciation.
    So, we both are the birds of the same feathers.
    Kind regs,
    Suresh C Sharma

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